हाँ, लौटना कठिन होता है !!!


दिन ,माह, बरस बीत गए 
तुम लौट कर नहीं आये 
हाँ, लौटना कठिन होता है !
कितने दिनों से उदास चांदनी
खिड़की से अंदर झांकती है 
तुम्हे खोजती है, नहीं पाती है 
चुपचाप लौट जाती है 
हाँ, लौटना कठिन होता है !!
कुछ ख्वाब दिल में उतरते हैं
हर शाम बस यूँ ही अकस्मात्
तुम्हारे साथ जीने की तमन्ना लिये
तुम्हे ढूंढते हैं हर कोने में 
मगर निराश होना पड़ता है उन्हें
घुप्प अँधेरे में चुपचाप लौट जाते हैं वे
हाँ , लौटना कठिन होता है !!!
कभी कुछ कदम बढ़ाता हूँ मैं भी 
तुम्हारे ही पद-चिन्हों पर 
तुम तक पहुँचने की चाह लिए 
मगर ये चिन्ह साथ कहाँ देते हैं 
दसों दिशाओं ने मिटा दिए हैं तुम्हारे निशां
मुझे विवश करती है ये प्रकृति लौट जाने को 
और एक दिन मैं लौट आता हूँ 
हाँ, लौटना कठिन होता है !!!

बेइंतहा मोहब्बत कीजिए !!!

मोहब्बत कीजिए ! बेइंतहा मोहब्बत कीजिए ! खुले आसमान में उड़ते उन्मुक्त पंछियों की तरह आजाद मोहब्बत कीजिए ! साहिल से बार बार टकराती लहरों की तरह जोरदार मोहब्बत कीजिए ! खिड़कियों को सहलाती, उनकी पीठ थपथपाती नर्म हवा की तरह पवित्र मोहब्बत कीजिए ! सुर्ख पत्तों को नम करती, उनसे लिपट जाने वाली,लिपट कर सरक जाने वाली ओस की तरह अंतिम सांस तक मोहब्बत कीजिए ! अँधेरे की बाहों में पसरी सुनसान सड़क पर निडरता से चलने वाले किसी राही की तरह बेधड़क मोहब्बत कीजिए ! कुदरत की कोख में समाये चाँद, सितारे, आसमान, बादल, नदी ,झरने, सागर, पहाड़, पेड़ पौधे, जंगल, मिट्टी के आपस में जुड़ी कहानी की तरह अटूट मोहब्बत कीजिए ! बेपनाह मोहब्बत कीजिए ! आखिरकार इंसानों को भगवान से प्राप्त सबसे खूबसूरत नेमत है "मोहब्बत"
हाँ, इस मोहब्बत में इतना ख्याल जरूर रखियेगा, कि अगर किसी दिन आपकी मोहब्बत आपसे दूर चली जाए, कारण कुछ भी रहा हो, लेकिन आपकी मोहब्बत अब आपकी न रह जाए, आपको छोड़कर चली जाए तो आपके अंतर्मन में उसके प्रति,उससे भी ज्यादा अपने प्रति, या समस्त संसार के प्रति नफरत की भावना न पैदा दो !
अकसर मोहब्बत को उदासी, गहरी पीड़ा, फिर नफरतों में तब्दील होते देखा गया है ! जैसे मजहबों की आग ने पृथ्वी के भौगोलिक पृष्ठभूमि के टुकड़े टुकड़े कर डाले, नफरत हमारे दिलों को अनंत टुकड़ों में बाँट देती है, छलनी कर देती हैं ! नफरत की आग में जलती हमारी निगाहों की परिधि सिमट जाती है और उसमें सिर्फ नकारात्मक विचारों के ज्वार-भाटे आते हैं ! नफरत के काले अँधेरे हमारे हमारी मोहब्बत को ही नहीं हमारी भावनाओं, हमारी इच्छाओं, हमारे ख्वाबों तक तो काला कर देते हैं, उन्हें दूषित कर देते हैं ! वह नफरत भले ही हम खुद से ही क्यों न करें !
नफरत से बेहतर है उदासीनता का भाव ! जहाँ हम यह मान लेते हैं कि हमारी मोहब्बत का अब कोई अस्तित्व ही नही है, हमारा कोई अस्तित्व नहीं है, मोहब्बत के जो खुशगवार पल हमने जिए वो एक बेहतरीन सपना था !
सपने टूट जाते हैं, बिखर जाते हैं और गुम हो जाते हैं ऐसे जैसे हम कभी उनसे मिले ही नही ! अगर आप यह कर सकें तो मोहब्बत कीजिए , बेपनाह मोहब्बत कीजिए !

पुरसुकून सांस लेता है सांस छोड़ने वाला !!!

फरिस्ता है इश्क में खुद को मिटाने वाला 
अक्सर हँसता है आसुंओं में नहाने वाला !

मैं कब से मुड़ मुड़ के तनहा राहे देखता हूँ
लौट कर कब आता है छोड़कर जाने वाला !

पल भर में ही वो नजरों से गायब हो गया 
सितारा जिसे था मैं प्यार से चूमने वाला !

हमेशा जान हथेली पर लेकर चलती हैं वे
मैं कौन होता हूँ उन्हें कुछ बोलने वाला !

मौत कहाँ रोक पायी है जीने वालों को 
पुरसुकून सांस लेता है सांस छोड़ने वाला !

कुछ रिश्ते साथ छोड़ देते हैं !!!


मुश्किलें बहुत बढ़ जाती हैं
वक़्त बेहद नाजुक हो जाता है 
जिम्मेदारियां थक जाती हैं
आहों भरी सदायें निकलती हैं 
नम आँखें भी बंजर हो जाती हैं 
रातें दर्द से फफक कर रो पड़ती हैं 
पल दर्द की पनाहों में जा बैठता है 
खिड़कियां, दरवाजे, राहें खो जाती हैं 
दो रूहों की दिशाएं बदल जाती हैं 
मजबूरन दिल इजाजत दे देता है 
उदासियों से खुद को भर लेता है 
और कुछ रिश्ते , खूबसूरत रिश्ते
यूँ ही चुपचाप साथ छोड़ देते हैं !!

मोहब्बत की खुशबू !!!


ये जो तुम इधर उधर पलट मुझे देखते हो 
किसी किताब के कवर पेज की तरह
और कैद कर देते हो किसी अलमारी में
न जाने क्या सोच समझ कर, बिना पढ़े
जैसे कोई नीरस, बेकार कचरे का ढेर 
 मगर जो हो फुरसत तो निकालना मुझे
बंद अलमारी से और रखना अपनी हथेली पर 
और खोलना मुझे वर्क दर वर्क, 
उधेड़ कर देखना मुझे पर्त दर पर्त 
 तुम पाओगी एक खूबसूरत दिल का टुकड़ा 
कोमल अहसासों से भरी एक रूह 
नर्म, नेकदिल, मित्र जैसा एक इंसान 
 तुम पाओगी अपनी हथेलियाँ महकती हुई 
तबस्सुम की सादगी से, मोहब्बत की खुशबू से !

तुम जो छोड़ जाओगी घर को..!!!


न चूड़ियों की खनखन होगी
न पायलों की छनछन होगी 
तुम जो छोड़ जाओगी घर को 
न बालियों की चमचम होगी !
दरवाजा चरमराकर रह जायेगा 
दरो-दीवारों की रंगत उतर जायेगी
रात चाँद खिड़की पर क्यों आएगा 
रात भर घर में रौशनी न होगी 
न सहर में फूलों पर शबनम होगी !
       तुम जो छोड़ जाओगी घर को.......

आओ कभी यूँ ही, अचानक !!!


आओ कभी यूँ ही, अचानक
न कोई फ़ोन , न कोई मैसेज
न कोई बहाना, न कोई कहासुनी, 
बस यूँ ही ,कभी अचानक 
जैसे टूट पड़ता है कोई सितारा
यूँ ही अचानक, किसी रात ! 
वही पीली साड़ी, हाथ 2 कंगन,
माथे पर छोटी सी कत्थई बिंदी 
न साजो-सामान से लिपा चेहरा
न ही सृंगार से लदा तुम्हारा बदन
दूर से ही मुझे देख दौड़ पड़ना 
शाम के धुंधलके में लिपट जाना 
गले में डाल देना अपनी बाहें 
और रंग जाना लाल मिटटी से 
बस यही तुम्हारा श्रृंगार होगा 
कभी यूँ ही किसी दिन, अचानक !!
शाम ढले, रात ढले, दिन आये 
तुम्हारे अधरों पर लौटने की जिद न आये
किसी सहर की भीगी हवाओं में 
सुनसान सड़क के किनारे
बिखरे गीले पत्तों को उठाते उड़ाते 
चले जाएँ बड़ी दूर तक 
एक दूसरे का हाथ थामे हुए
बेवजह, बेधड़क , बिन आवाज
न देर होने का भय हो 
न जलती धूप का असर हो 
चलते जाएँ हम तुम अनवरत
बस यूँ ही अचानक किसी दिन
न कोई फ़ोन, न कोई मेसेज !!!!

हाँ, मुझे भी तो अब तुमसे डर लगता है !!


हाँ, मैं अब तुम्हे “हाय-हेल्लो” नहीं करता, तुम्हे फ़ोन भी नहीं करता, तुमसे बात करने की शुरुवात नहीं करता ! हालाँकि मन बहुत करता है कि तुम्हे दिन भर की बातें बताऊँ ! तुमसे बताऊँ की आज बारिश की वजह से मौसम बहुत खुशनुमा हो गया है ठीक वैसे ही जिस शाम हम पहली बार मिले थे ! तुमसे बताऊँ की आज दूध नहीं था और बाहर जाने का मन नही हुआ तो मैंने काली चाय बनायीं ! तुम्हे फ़ोन करके बताऊँ कि आज ऑफिस में मुझे प्रमोशन मिला है और मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे फेवरेट कलर की ड्रेस खरीदी है !
लेकिन मैं ये सब नहीं बता पाता ! मैं डर गया हूँ तुम्हारे जवाबों से, जब तुम हेल्लो के जवाब में लिखती हो “थोड़ी बिजी हूँ” ! कॉल पर मैं रहता हूँ और तुम बातें किसी और से करती हो ! डर लगता है यह सोचकर कि तुम्हारे पास तुम्हारी व्यस्त जिन्दगी में मेरे लिए 2 मिनट भी नहीं है ! कुछ कहता नहीं हूँ लेकिन बहुत अजीब लगता है जब अब भी तुम बात ख़त्म करते वक्त कहती हो “लव यू” ! हिम्मत मैं भी करता हूँ “लव यू टू” बोलने की लेकिन आवाज गले में ही फंसकर रह जाती है जैसे बंद पिंजरे में कैद पक्षी अंदर ही अंदर कितना भी फड़फड़ाए लेकिन बाहर नहीं निकल पाता ! 
 तुम अक्सर कहा करती थी पेड़ों से जड़ सूख जाने के बाद उसके पत्ते हरे नहीं रह सकते ! अब तुम इसे कभी नहीं दोहराती ! भूल गयी हो शायद ! हाँ अपने काम में सब कुछ तो भूल गयी हो तुम !
हर इंसान की दिली ख्वाहिश होती है कि वो अपने हमसफ़र के साथ एक बेहद हसीन सफ़र की शुरुवात करे और सफ़र के बीच में ही किसी दिलकश राहे-मोहब्बत पर जाकर ठहर जाए ! इस ठहरी हुई राह की कोई मंजिल न हो, कोई पता न हो, कुछ हासिल करने की जल्दी न हो, बेहद अंतहीन, अनंत तक, सबसे पार क्षितिज तक, और हो तो बस दूर दूर तक फैली मोहब्बत की खुशबू ! लेकिन ऐसा होता कहाँ है ! प्यार की राह से हम कब डर, भय, आशंकाओं की राह पर आ जाते हैं, हमें पता ही नहीं चलता ! मोहब्बत किसी टूटी हुई डाली के पत्तों की तरह सूख जाती है,रह जाता है तो बस उसके टूटे फूटे बिखरे कुछ अंश, जिसे समेटने, सहेजने की कोशिश में हम अपनी बाकी जिन्दगी गुजार देते हैं और हमें लगता है हम अब भी मोहब्बत कर रहे हैं, हम सही राह पर हैं ! बैसाखी पर चलने वाली लंगड़ी मोहब्बत को हम 4 पैरों पर नाचने वाली मोहब्बत मान बैठते हैं ! कितना गलत है सब, कितनी झूठी मिथ्याओं पर टिकी है ये दुनिया ! 
हाँ मुझे भी तो अब तुमसे डर लगता है !!

तुम जो बसी हो मुझमें, सम्पूर्ण !!!

हाँ, मैं नही समझ पाता तुम्हे
तुम्हारे जेहन में उठते ख्यालों को
जो शाख से लगे किसी पत्ते की तरह
कभी इस ओर तो कभी उस ओर लुढ़क जाते हैं....
हाँ मेरी आँखें नही पढ़ पाती हैं
तुम्हारे चेहरे पर लिखे भावों को
जो हर पल बदल जाते हैं.....
हाँ नहीं समझ पाता हूँ मैं
तुम्हारे खामोश इशारों को
जो कभी स्पष्ट होते ही नहीं....
हाँ बस इतना जानता हूँ
मोहब्बत थी तुमसे, बेपनाह, है भी
कभी ख़तम भी नही होगी ये
बस क्षीण होती रहेगी धीरे-धीरे
फिर भी तुम बची रह जाओगी अंत तक
कहीं दिल के किसी कोने में सम्पूर्ण !!!

मैं तो हर शबे-महताब चलूँ !!!

 पागल-पागल कहते फिरते मैं फिर भी उनकी राह चलूं |
हो दश्त-ए गम कितना भी मैं हर रस्ता बे-हिरास चलूं |
इस मुकम्मल जहान में महबूब न कोई आशना मेरा
अहद-ए-शबाब लेकर मैं फिर भी उल्फत-ए-राह चलूं |
गुजरता हुआ वक़्त और फ़िगार सा ठहरता हुआ मैं  
हंसीं आखों में लिए ख्वाब तेरा तेरे तलबगार चलूँ |
यहाँ दिन में उजाले नहीं होते ,ये मायावी दुनिया है
जलता बुझता जुगनूँ सा मैं तो हर शबे-महताब चलूँ |
अहद-ए-शबाब=जवानी का वक्त
बे –हिरास= बिना डर के
फ़िगार= चिन्तित 

एक उदास रात !!!

11 बजने को हो गये हैं | रात जवां हो गयी है | फलक पर सितारे नाच रहे हैं, चाँद मुस्कुरा रहा है | चांदनी लोगों के दिलों में मुहब्बत के तराने गा रही है | कहीं ख्वाब पिघल रहे हैं, आरजुएं सिमट रहीं हैं, सदायें दम तोड़ रही हैं, खामोशियाँ बातें कर रही हैं, कहीं जिस्म नजदीक आ रहे हैं, रूहें एक हो रही हैं, धरती मुहब्बत के इस अफ़साने में डूब गयी है और मैं......!
अकेला हूँ मैं, निपट अकेला | इतना कि खुद से बातें करते हुए भी डर लगता है मुझे | दरवाजे पर ही बैठा हूँ तुम्हारी आस में | ये गहराई हुई रात, ये चाँद सितारे, ये फैली चांदनी, ये हवाएं, फिजायें.........क्या करूं मैं इनका | तुम बिन सब बेकार है, बेहया, बेशर्म लगते हैं मुझे | मेरे न चाहने पर भी चले ही आते हैं | हाँ, मेरे चाहने से होता भी क्या है ? मैंने कभी नहीं चाहा की कोई मेरी जिन्दगी में आये लेकिन तुम आ गयी | मैंने कभी नहीं चाहा था मुहब्बत करना लेकिन हो गयी | मैंने कभी नहीं चाहा था की तुम जाओ लेकिन तुम चली गयी | मैं चाहता हूँ तुम वापस आ जाओ लेकिन......|
खैर, मैं सच में बहुत उदास हूँ यार | जैसे किसी गरीब बच्चे का सबसे महंगा खिलौना टूट गया हो | अब हिम्मत भी नहीं रही तुमसे गुस्सा होने की, तुमसे शिकायत करने की, या फिर से तुमसे तुम्हे वापस मांगने की | शायद मैं मोहब्बत के उस मुकाम पर पहुँच गया हूँ जहाँ गिले-शिकवे, वफाई, बेवफ़ाई जैसे लफ्ज मर ही जाते हैं बस खामोश सा दर्द ही रह जाता है जो हर पर मेरे जिन्दा होने का अहसास कराता रहता है |
जानता हूँ | सितारे नाच गाकर चले जायेंगे | चाँद थक हार कर सो जायेगा | सहर में बरसी शबनम में सब मदहोशी खोने लगेंगे | पंछी चहचहाने लगेंगे, जानवर नदी की ओर जाने लगेंगे, कलियाँ फूल बनने लगेंगी, इन्सान बिस्तर पर करवट लेने लगेगा और मैं.........| मैं तब भी ऐसे ही उदास बैठा रहूँगा, तुम्हारी आस में ..........!

सफ़र में कभी कोई साथ आया ही नहीं !!!

नज़र नज़र में उसने फंसाया ही नहीं
उसकी बातों में कभी मैं आया ही नही !
जुस्तजू तो थी आरती उतारूँगा मैं भी
 चाँद मेरे घर तो कभी आया ही नही !
रौंदा है इक निकहत-ए ख्याल ने मुझे
साथ अपने अब अपना साया ही नहीं !
शरर उठी थी कहीं दस्त-ओ-दरिया में
खौफज़दा हो नौबहार आया ही नही ! मैं
 रूठूँ तो किससे रूठूँ, कौन मेरा है
सफ़र में कभी कोई साथ आया ही नहीं !

वरमाला प्रेम की !!

ऐसे ही हर शाम की तरह वह भी एक आवारगी भरी शाम थी | हम लाल और काले रंग की चतुर्भुज डिजाईन वाली शर्ट पहने, ऊपर के २ बटन खोले, कॉलर खड़ी किये वहीँ गली की मोड़ पर इकलौती पान वाली दूकान के किनारे ४ दोस्तों के साथ सिगरेट फूँक रहे थे और ये मोहतरमा बगल से गुजरीं | आवारा दोस्त, यूँ किसी को कैसे जाने देते | एक ने जोर से कश भरी, धुंए का छल्ला बनाया और छोड़ दिया इनकी तरफ | धुआं ने तो इन्हें नहीं छुआ लेकिन इन्होने काट खाने वाली नजरों से हम सबकी तरफ देखा |  “बदतमीज इनके मीठे ओंठों से बस इतना ही निकला था | आहा, उसी “बदतमीज” के साथ हमारा ये बदतमीज दिल भी धक् से हो गया | उसी जलती सिगरेट की छोटी सी आग ने हमें शर्म से जला के ख़ाक कर दिया |
हम भी दौड़ कर पहुँच गये उनके पास और कान पकड़ लिए | कक्षा ८ की पढ़ाई अब काम आने वाली थी | सॉरी (अंग्रेजी में), जब तक आप माफ़ नहीं करेंगी हम आपका रास्ता नहीं छोड़ेंगे |
उन्होंने झील सी आँखों का सारा पानी हम पर बरसा दिया “ये क्या बदतमीजी है ?”
हम तो डूब ही गये उनकी आँखों में | बचने की कोई गुजाइश नहीं थी | लेकिन देखिये न, उन्होंने की बचा लिया !
रास्ता छोडिये मेरा !
हुक्म था दिल की मल्लिका का | हमने भी हुक्म की तामील की और हट गये |
 “यू गो“ अंग्रेजी में फुल कॉन्फिडेंस के साथ बोले थे हम |
कुछ ही दिन में वही मोहतरमा हमारे लिए क्या नहीं हो गयी | सब्ज्परी, उड़नपरी, सोनपरी, अप्सरा, गुलाबो, जलेबी सब वहीँ तो थी हमारी (कैसे बनीं इसकी कहानी किसी दिन शाम की चाय पर बताऊंगा) | हम भी तो उनके सोना, बाबू और बच्चा हो गये थे |
दिल फ़ुटबाल सा उछलने लगे थे, रात जगते हुए कटने लगी ,यूँ कहें की उनके साथ जिन्दगी १७६५ की कश्मीर जैसी हो गयी | एक जन्नत | सजी, संवरी, महकी. हर रंगों में रंगी ,बेहद खूबसूरत |
लेकिन दुनिया का सितम, किसी की नजर लग गयी हमारी दुनिया को | पिछले हफ्ते ही शादी हो गयी हमारी सोनपरी की | शादी के ठीक पहले वाली रात उन्होंने फ़ोन पर कहा “ आप शादी में नहीं आयेंगे तो मैं मंडप में नही जाउंगी | वरमाला मैं किसी के भी गले में डालूं लेकिन मैं अपनी नजरों के सामने तुम्हे देखना चाहती हूँ |
दिल दर्द से टूट रहा था ,पैरों में चलने की शक्ति नहीं थी लेकिन जाते कैसे नहीं | खड़े हुए उनके सामने ओंठों पर मुस्कान, और आँखों में आंसू लिए | उन्हें देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो वरमाला दूल्हे को नहीं हमें ही पहना रहीं हो |

खैर, शादी किसी और से हो गयी तो क्या, अब भी वो हमारे पास ही आती हैं | हर शाम जब हम अकेले होते हैं वो चली आती हैं हमारे पास | हम भी ठहरे यू.पी. के पक्के आशिक | ७ फेरे किसी और के साथ ले लिए तो क्या उनकी रूह तो अब भी हमारी रूह में ही वास करती है | उन्हें देखते ही हम झट से भर लेते हैं अपनी बाहों में और चूम लेती हैं वो हमारे पेशाने | हम मना करते हैं तो खिलखिलाकर हंस पड़ती हैं | लेकिन यह सब अब बस यादों में होता है | पक्के आशिक हैं न | ऐसे नहीं छोड़ेंगे | प्यार किया है, जिन्दगी भर निभायेंगे | 

चले जाओ, तुम्हे जो जाना है !!!

चले जाओ, तुम्हे जो जाना है
 यूँ रुक कर खुद पर सितम न करो 
 सुर्ख आँखें मेरी सुर्ख ही रहेंगी 
की तुम्हारे जाने के गम में 
 मेरे रुखसार से कोई बूँद न गुजरेगी
 यूँ ही कभी याद जो आई तुम्हारी
 फकत इतना सा होगा की
 दिल के किसी कोने में
 कई आईने एक साथ टूट जायेंगे 
 मगर हाँ, उस आईने में शक्ल तुम्हारी ही होगी !
 तुम, तुम्हे तो गुल-ए-राहें मिलेंगी
 हयात की हर शाम शबे-महताब मिलेंगी
 कफ़स तो नसीब में है हम जैसों के
 तुम्हे तो महलों की दरें दीवारें मिलेंगी
 रानाईयाँ बरसेंगी तुम पर इश्क़ की 
 खिजां में भी तुम्हे बहारें मिलेंगी 
मेरी सुबहें तो सुकूत-ए-मुसलसल होंगी
 हर सहर तुम्हे मीठी सदायें मिलेंगी 
 मगर जो अचानक कहीं देख लोगी तुम 
किसी की सुर्ख आँखों में मरते हुए खवाब 
कुछ टूटे फूटे बेमतलब अल्फाज 
 जो तुम्हारे कानों में गूँज जाएंगे
 मेरी यादें अनजाने ही खटखटा जाएँगी 
 तुम्हारे बंद दिल का कोई हिस्सा 
मैं याद आऊंगा तुम्हे , इतना की 
रुखसार पर तुम्हारे मोती पिघलने लगेंगे
 तुम समेटना चाहोगी उन टूटे अल्फाजों को
 हाथों में भरना चाहोगी, मगर कहाँ
 वह तो तुम्हारे हाथों से फिसल जायेंगे 
मिल जायेंगे तुम्हारी ही मिट्टी में 
 तुम वापस जो आना भी चाहोगी 
तो राहों से तुम्हारे ही निशान मिट चुके होंगे 
 तरस जाओगी मेरे कफ़स की खातिर 
 इतना की खुद से हार जाओगी तुम 
 मगर हम, हम तब भी नही मिलेंगे तुम्हे
 हम तो तुमसे पहले ही मिट चुके होंगे !!! 


 रुखसार-गाल 
 हयात-जिंदगी 
कफ़स- कैदखाना, पिंजरा 
रानाईयां- स्नेह
 खिजां - पतझड़,
 पतन सुकूत-ए-मुसलसल--लगातार ख़ामोशी का बने रहना

इक रात जो बसर हो जाए !!!

जिन्दगी में नौबहार की मुसलसल सहर हो जाए 
तुम्हारी बाहों में मेरी इक रात जो बसर हो जाए !
 ये रुखसार, ये पेशाने, ये साहिर आँखें तुम्हारी
जो निकलें नकाब से बाहर तो ग़ज़ल हो जाए !
नाओनोश भी, मदहोश भी, अहसास जफ़र का हो
तुम्हारी इनायत का जिस पर भी असर हो जाए !
कभी चाँद को जो देखो तुम आँखों में भरकर
रात का जैसे किसी सब्जपरी से मिलन हो जाये !
जिस रहगुजर से तुम गुजर जाओ, राहें कदम चूमे
अफ़सुर्दा उजाड़ सफ़र भी जाज़िब बदन हो जाए !!
अफ़सुर्दा – उदास
नाओनोश-  दावत करना
जफ़र- जीत 
साहिर – जादूगरी

जाज़िब – आकर्षक 

बेशक़ीमती गहने हों जैसे !!!


शर्म हया लाज घूंघट मुस्कराहट उसने पहने हैं कुछ ऐसे 
बड़ी दुर्लभता से मिलने वाले बेशक़ीमती गहने हों जैसे !!
जलती तपती उड़ती रेतों को वो अंजलि में यूँ भरती है 
मेले में खोकर फिर मिलने वाले उसके बच्चे हों जैसे !!
थमते बहते गिरते अश्कों को चूमती है जो नजरों से ही 
निकल कैद उन्मुक्त गगन में उड़ने वाले सपने हों जैसे !!
रूकती चलती थकती आगे बढ़ते ही जाना है उसको 
सारी दुनिया के गम निपट अकेले ही सहने हों जैसे !!!

वो रोज मेरी निगाहों में झांकता रहता है !!!


वो रोज मेरी निगाहों में झांकता रहता है
न जाने क्या उसमे ढूंढता रहता है 
जो ढक लेती हैं पलकें निगाहें मेरी 
उसकी आँखों से कुछ पिघलने लगता है 
जो पूछता हूँ उससे इस बेकरारी का सबब 
जवाब में बस आँखों से मुस्कुराने लगता है !!!

तुम्हारे आ जाने से क्या बदल जायेगा.!!!

तुम पूछते हो इक तुम्हारे आ जाने से क्या बदल जायेगा..??
 किसी के सूखे ओंठ खिलकर गुलाब की पंखुड़ी बन जायेंगे 
किसी के उजाड़ चेहरे पर गुलाबी रंगत खिल जायेगी
 किसी की सूखती आँखों से मुहब्बत की नमी बह जायेगी
 किसी के ख्वाब की सूखी टहनियों पर कोपलें लहलहा जायेगीं
 किसी की थमी हुई धड़कन से सदा निकल कर बिखर जाएगी 
और तुम हो कि पूछते हो, इक तुम्हारे आ जाने से क्या बदल जायेगा..??

अलसाई रात में पसरी चांदनी !!!


बेइन्तहां गर्मी से परेशान छत पर बैठी 
जब निहारो उस आसमान में तारों को 
और वो तारे तुम्हे अनजाने से लगें 
जैसे तुम उन्हें पहली बार देख रही हो !!
दूसरे पहर गए जब शहर की बत्तियाँ
टिमटिमाना बंद कर दें और तुम्हे 
अलसाई रात में पसरी चांदनी उदास लगे 
जैसे वो पहली बार धरती पर उतरी हों 
तुम टटोलोगी तब अपने बगल में बिछी
उस पतली सी चादर को 
और नही पाओगी वहां मेरे निशाँ 
फिर याद आएँगी तुम्हे वो रातें 
जब मैं तुम्हे तारों के नजदीक ले जाता था 
तुम उनसे दोस्ती करती थी, बातें करती थी !!
तुम्हे याद आएगा वो लुका छिपी का खेल
जो हम चांदनी के साथ खेला करते थे 
और तुम जानबूझ मुझसे हार जाया करती थी !!
तुम फिर टटोलोगी उस चादर को इस आस में 
कि शायद अब भी मैं तुम्हे वहीँ मिल जाऊं 
लेकिन वहां गर्म हवाओं के सिवा कुछ नही होगा 
मैं याद आऊंगा और तुम्हारी भूरी आँखों से 
कुछ गर्म आंसू तकिये पर गिर कर बिखर जायेंगे 
ठीक वैसे ही जैसे तुमने कभी मुझे गिरा दिया था 
अपनी नजरों से, अपने लम्हों से,अपने आप से
टूट कर बिखर जाने के लिए 
कभी वापस लौटकर ना आने के लिए !!!

क्या कहती हो,तुम आओगी न !!!


क्या कहती हो,, तुम आओगी न !!!
वक्त जब मुझसे किसी मोड़ पर रूठ जाए 
बेस्वाद सा दिन जाए, अकेली रात आये
उस पर भी यादों की गिरफ्त हो इतनी 
कि तन्हाई दर्द, मोहब्बत जुर्म हो जाये 
तुम कहीं छोड़ कर गुरूर अपना, 
टिमटिमाते तारों के बीच से उतर आना 
बिखरी चांदनी में रात को गवाह बना
मेरा हाथ अपने हाथ में तुम थाम लेना !!!
बीतती जिंदगी का जब वो वक़्त भी आये 
मेरी बूढी आँखें जो पहचान न पाएं तुम्हे 
मेरे कांपते लफ्ज भी पुकार न पाएं तुम्हे
मैं तड़पूँ किसी की निगाहों में झाँकने को 
मैं रोऊँ कोई पहचानी आवाजें सुनने को
पायल की छन छन करते तुम आना तब 
रख कर ऊँगली ओंठों पर अपनी 
बस एक बार अपने अंदाज में मुस्कुरा देना !!!
कभी मेरी जिंदगी का वो लम्हा भी आये 
उगते सूरज के साथ मेरी शाम ढलने लगे
मेरी निगाहों में संसार धुंधला हो जाए 
धड़कने मेरी अचानक धड़कना छोड़ने लगें 
मेरे कांपते हाथ टटोलें अपने आस पास 
कोई भी मेरे हाथों को सहारा न दे पाये 
मैं चीखूं चिल्लाऊं कुछ नामों को 
मगर आवाज गले में ही फंसकर रह जाए 
जब आँखों दिल से सारी आशाएं मिट जाएँ 
अंजुलि में ज्योति लेकर दूर कहीं से तुम आना
अपनी कोमल बाहों में सिर रख कर मेरा 
मेरे जाते जाते मेरी रूह को तुम छू लेना !!!
तुम आओगी न !!!