सफ़र में कभी कोई साथ आया ही नहीं !!!

नज़र नज़र में उसने फंसाया ही नहीं
उसकी बातों में कभी मैं आया ही नही !
जुस्तजू तो थी आरती उतारूँगा मैं भी
 चाँद मेरे घर तो कभी आया ही नही !
रौंदा है इक निकहत-ए ख्याल ने मुझे
साथ अपने अब अपना साया ही नहीं !
शरर उठी थी कहीं दस्त-ओ-दरिया में
खौफज़दा हो नौबहार आया ही नही ! मैं
 रूठूँ तो किससे रूठूँ, कौन मेरा है
सफ़र में कभी कोई साथ आया ही नहीं !