तुम्हारे आ जाने से क्या बदल जायेगा.!!!

तुम पूछते हो इक तुम्हारे आ जाने से क्या बदल जायेगा..??
 किसी के सूखे ओंठ खिलकर गुलाब की पंखुड़ी बन जायेंगे 
किसी के उजाड़ चेहरे पर गुलाबी रंगत खिल जायेगी
 किसी की सूखती आँखों से मुहब्बत की नमी बह जायेगी
 किसी के ख्वाब की सूखी टहनियों पर कोपलें लहलहा जायेगीं
 किसी की थमी हुई धड़कन से सदा निकल कर बिखर जाएगी 
और तुम हो कि पूछते हो, इक तुम्हारे आ जाने से क्या बदल जायेगा..??

अलसाई रात में पसरी चांदनी !!!


बेइन्तहां गर्मी से परेशान छत पर बैठी 
जब निहारो उस आसमान में तारों को 
और वो तारे तुम्हे अनजाने से लगें 
जैसे तुम उन्हें पहली बार देख रही हो !!
दूसरे पहर गए जब शहर की बत्तियाँ
टिमटिमाना बंद कर दें और तुम्हे 
अलसाई रात में पसरी चांदनी उदास लगे 
जैसे वो पहली बार धरती पर उतरी हों 
तुम टटोलोगी तब अपने बगल में बिछी
उस पतली सी चादर को 
और नही पाओगी वहां मेरे निशाँ 
फिर याद आएँगी तुम्हे वो रातें 
जब मैं तुम्हे तारों के नजदीक ले जाता था 
तुम उनसे दोस्ती करती थी, बातें करती थी !!
तुम्हे याद आएगा वो लुका छिपी का खेल
जो हम चांदनी के साथ खेला करते थे 
और तुम जानबूझ मुझसे हार जाया करती थी !!
तुम फिर टटोलोगी उस चादर को इस आस में 
कि शायद अब भी मैं तुम्हे वहीँ मिल जाऊं 
लेकिन वहां गर्म हवाओं के सिवा कुछ नही होगा 
मैं याद आऊंगा और तुम्हारी भूरी आँखों से 
कुछ गर्म आंसू तकिये पर गिर कर बिखर जायेंगे 
ठीक वैसे ही जैसे तुमने कभी मुझे गिरा दिया था 
अपनी नजरों से, अपने लम्हों से,अपने आप से
टूट कर बिखर जाने के लिए 
कभी वापस लौटकर ना आने के लिए !!!

क्या कहती हो,तुम आओगी न !!!


क्या कहती हो,, तुम आओगी न !!!
वक्त जब मुझसे किसी मोड़ पर रूठ जाए 
बेस्वाद सा दिन जाए, अकेली रात आये
उस पर भी यादों की गिरफ्त हो इतनी 
कि तन्हाई दर्द, मोहब्बत जुर्म हो जाये 
तुम कहीं छोड़ कर गुरूर अपना, 
टिमटिमाते तारों के बीच से उतर आना 
बिखरी चांदनी में रात को गवाह बना
मेरा हाथ अपने हाथ में तुम थाम लेना !!!
बीतती जिंदगी का जब वो वक़्त भी आये 
मेरी बूढी आँखें जो पहचान न पाएं तुम्हे 
मेरे कांपते लफ्ज भी पुकार न पाएं तुम्हे
मैं तड़पूँ किसी की निगाहों में झाँकने को 
मैं रोऊँ कोई पहचानी आवाजें सुनने को
पायल की छन छन करते तुम आना तब 
रख कर ऊँगली ओंठों पर अपनी 
बस एक बार अपने अंदाज में मुस्कुरा देना !!!
कभी मेरी जिंदगी का वो लम्हा भी आये 
उगते सूरज के साथ मेरी शाम ढलने लगे
मेरी निगाहों में संसार धुंधला हो जाए 
धड़कने मेरी अचानक धड़कना छोड़ने लगें 
मेरे कांपते हाथ टटोलें अपने आस पास 
कोई भी मेरे हाथों को सहारा न दे पाये 
मैं चीखूं चिल्लाऊं कुछ नामों को 
मगर आवाज गले में ही फंसकर रह जाए 
जब आँखों दिल से सारी आशाएं मिट जाएँ 
अंजुलि में ज्योति लेकर दूर कहीं से तुम आना
अपनी कोमल बाहों में सिर रख कर मेरा 
मेरे जाते जाते मेरी रूह को तुम छू लेना !!!
तुम आओगी न !!!