तुम जो बसी हो मुझमें, सम्पूर्ण !!!

हाँ, मैं नही समझ पाता तुम्हे
तुम्हारे जेहन में उठते ख्यालों को
जो शाख से लगे किसी पत्ते की तरह
कभी इस ओर तो कभी उस ओर लुढ़क जाते हैं....
हाँ मेरी आँखें नही पढ़ पाती हैं
तुम्हारे चेहरे पर लिखे भावों को
जो हर पल बदल जाते हैं.....
हाँ नहीं समझ पाता हूँ मैं
तुम्हारे खामोश इशारों को
जो कभी स्पष्ट होते ही नहीं....
हाँ बस इतना जानता हूँ
मोहब्बत थी तुमसे, बेपनाह, है भी
कभी ख़तम भी नही होगी ये
बस क्षीण होती रहेगी धीरे-धीरे
फिर भी तुम बची रह जाओगी अंत तक
कहीं दिल के किसी कोने में सम्पूर्ण !!!

मैं तो हर शबे-महताब चलूँ !!!

 पागल-पागल कहते फिरते मैं फिर भी उनकी राह चलूं |
हो दश्त-ए गम कितना भी मैं हर रस्ता बे-हिरास चलूं |
इस मुकम्मल जहान में महबूब न कोई आशना मेरा
अहद-ए-शबाब लेकर मैं फिर भी उल्फत-ए-राह चलूं |
गुजरता हुआ वक़्त और फ़िगार सा ठहरता हुआ मैं  
हंसीं आखों में लिए ख्वाब तेरा तेरे तलबगार चलूँ |
यहाँ दिन में उजाले नहीं होते ,ये मायावी दुनिया है
जलता बुझता जुगनूँ सा मैं तो हर शबे-महताब चलूँ |
अहद-ए-शबाब=जवानी का वक्त
बे –हिरास= बिना डर के
फ़िगार= चिन्तित 

एक उदास रात !!!

11 बजने को हो गये हैं | रात जवां हो गयी है | फलक पर सितारे नाच रहे हैं, चाँद मुस्कुरा रहा है | चांदनी लोगों के दिलों में मुहब्बत के तराने गा रही है | कहीं ख्वाब पिघल रहे हैं, आरजुएं सिमट रहीं हैं, सदायें दम तोड़ रही हैं, खामोशियाँ बातें कर रही हैं, कहीं जिस्म नजदीक आ रहे हैं, रूहें एक हो रही हैं, धरती मुहब्बत के इस अफ़साने में डूब गयी है और मैं......!
अकेला हूँ मैं, निपट अकेला | इतना कि खुद से बातें करते हुए भी डर लगता है मुझे | दरवाजे पर ही बैठा हूँ तुम्हारी आस में | ये गहराई हुई रात, ये चाँद सितारे, ये फैली चांदनी, ये हवाएं, फिजायें.........क्या करूं मैं इनका | तुम बिन सब बेकार है, बेहया, बेशर्म लगते हैं मुझे | मेरे न चाहने पर भी चले ही आते हैं | हाँ, मेरे चाहने से होता भी क्या है ? मैंने कभी नहीं चाहा की कोई मेरी जिन्दगी में आये लेकिन तुम आ गयी | मैंने कभी नहीं चाहा था मुहब्बत करना लेकिन हो गयी | मैंने कभी नहीं चाहा था की तुम जाओ लेकिन तुम चली गयी | मैं चाहता हूँ तुम वापस आ जाओ लेकिन......|
खैर, मैं सच में बहुत उदास हूँ यार | जैसे किसी गरीब बच्चे का सबसे महंगा खिलौना टूट गया हो | अब हिम्मत भी नहीं रही तुमसे गुस्सा होने की, तुमसे शिकायत करने की, या फिर से तुमसे तुम्हे वापस मांगने की | शायद मैं मोहब्बत के उस मुकाम पर पहुँच गया हूँ जहाँ गिले-शिकवे, वफाई, बेवफ़ाई जैसे लफ्ज मर ही जाते हैं बस खामोश सा दर्द ही रह जाता है जो हर पर मेरे जिन्दा होने का अहसास कराता रहता है |
जानता हूँ | सितारे नाच गाकर चले जायेंगे | चाँद थक हार कर सो जायेगा | सहर में बरसी शबनम में सब मदहोशी खोने लगेंगे | पंछी चहचहाने लगेंगे, जानवर नदी की ओर जाने लगेंगे, कलियाँ फूल बनने लगेंगी, इन्सान बिस्तर पर करवट लेने लगेगा और मैं.........| मैं तब भी ऐसे ही उदास बैठा रहूँगा, तुम्हारी आस में ..........!