चुपके चुपके रोई होंगी ???


आज दिल कुछ उदास सा है 
तनहा, अकेला और गुमसुम सा 
रात की बाहों में बैठा 
ना जाने क्या सोच रहा है |
शायद सोच रहा है अपनी बेरंग जिन्दगी के बारे में 

कभी कुछ रंग भरने चाहे होंगे इसमें 
लेकिन किस्मत दगा दे गयी होगी 
आज अलसाए से चाँद की रोशनी में 
शायद वो अपने टूटे सपनों को समेट कर 
उन्हें जोड़ने की सोच रहा है |
या शायद टूटे तारों को देखकर सोच रहा है 
कितने रिश्ते टूटे हैं उसके
कितने टूटने वाले हैं ?
कितनी बार आँखें भर आई हैं 
कितने आंसू बहने अभी बाकी है ?
कौन अपना बनकर छोड़ गया 
कौन अपना बनाने वाला है ?
या फिर पिघलती रात के संग संग
वह सोच रहा है उस बीते लम्हों को 
उन बचपन वाली बातों कों 
वो नंगे धड़ंगे दोस्त गरीब 
पर दिल के थे सब बड़े अमीर
इस चकाचौंध सी दुनिया में 
वे बेचारे अब कैसे होंगे
क्या मेरे जैसे उनके दिल भी 
कतरा कतरा टूटे होंगे ???
क्या उनकी आँखें भी मेरे जैसे 
चुपके चुपके रोई होंगी ???

बरसती,भीगती मचलती जिन्दगी !!!

जुगनुओं सी लगती है जिन्दगी
जब साथ होती हो तुम,
घोर अँधेरे में चमकती, दमकती,
मुस्कुराती जिन्दगी |
एक दर्द का साया उठता है
न जाने क्यों बस मेरी तरफ बढ़ता है,
डर जाता हूँ, अंदर से हिल जाता हूँ ,
मेरे लम्हों में सूनापन बढ़ने लगता है
कि हौले से आती हो तुम,
तुम्हारी गर्म छुवन से मेरे ठंडे हाथ
नर्म सा पड़ने लगते हैं
तुम्हे पास पाकर सारे दर्द जाने कहाँ चले जाते हैं
कुछ रह जाता है तो वह,
भोर के फूल सी महकती, चहकती
झूमती जिन्दगी |
हर तरफ हर जगह एक भीड़ सी है
और हर इंसान की तरह मै भी यहाँ तनहा,
कि गुजरती हो तुम मेरे करीब से
हमराह सी नजरें गिरती हैं मुझपर
तन्हापन के बादल छंटने लगते हैं
और रह जाती है तो बस
मुलायम बूंदों सी बरसती,भीगती
मचलती जिन्दगी |

दो सहेलियां !!!

वक्त की दहलीज पर खड़ा मै निहारता रहता हूँ
एक तरफ दूर तक फैली मुस्कुराती ख़ुशी को 
तो दूसरी तरफ पसरी खामोश उदासी को |
मुझे याद है जब दोनों सहेलियां हुआ करती थीं
एक दूसरे का हाथ पकड़ साथ-साथ चलती थी |
दोनों रूप भी बदलती थीं ,
कभी ख़ुशी उदासी बन जाती थी
तो कभी उदासी ख़ुशी का रूप ले लेती थी
दोनों मचलते हुए मेरे पास आती थीं,
मै उन्हें पहचान ही नहीं पाता था
और दोनों को ही गले से लगा लेता था |
लेकिन वक़्त की जंजीरों में बंधा,
मै न जाने कब बहुत दूर निकल गया
और जब पीछे मुड़कर देखा तो पाया
अनजाने में ही मैंने उनका घर बदल दिया था
उन्हें अलग कर दिया था |
ख़ुशी मुझे अच्छी लगती थी
मैंने उसे अपने ओंठों पर बिठा लिया
और उदासी को दूर आँख के कोने में छिपा दिया |
 इस तरह तोड़ दिया मैंने उनके बीच पनप रहे
कभी न मिटने वाले मुबब्बत के सिलसिले को |
दोनों कभीं नही मिल पाती हैं अब
न कभी ख़ुशी आँखों तक पहुँच पाती है
और न ही मै कभी ओंठों पर उदासी को आने देता हूँ |