हाँ, मुझे भी तो अब तुमसे डर लगता है !!


हाँ, मैं अब तुम्हे “हाय-हेल्लो” नहीं करता, तुम्हे फ़ोन भी नहीं करता, तुमसे बात करने की शुरुवात नहीं करता ! हालाँकि मन बहुत करता है कि तुम्हे दिन भर की बातें बताऊँ ! तुमसे बताऊँ की आज बारिश की वजह से मौसम बहुत खुशनुमा हो गया है ठीक वैसे ही जिस शाम हम पहली बार मिले थे ! तुमसे बताऊँ की आज दूध नहीं था और बाहर जाने का मन नही हुआ तो मैंने काली चाय बनायीं ! तुम्हे फ़ोन करके बताऊँ कि आज ऑफिस में मुझे प्रमोशन मिला है और मैंने तुम्हारे लिए तुम्हारे फेवरेट कलर की ड्रेस खरीदी है !
लेकिन मैं ये सब नहीं बता पाता ! मैं डर गया हूँ तुम्हारे जवाबों से, जब तुम हेल्लो के जवाब में लिखती हो “थोड़ी बिजी हूँ” ! कॉल पर मैं रहता हूँ और तुम बातें किसी और से करती हो ! डर लगता है यह सोचकर कि तुम्हारे पास तुम्हारी व्यस्त जिन्दगी में मेरे लिए 2 मिनट भी नहीं है ! कुछ कहता नहीं हूँ लेकिन बहुत अजीब लगता है जब अब भी तुम बात ख़त्म करते वक्त कहती हो “लव यू” ! हिम्मत मैं भी करता हूँ “लव यू टू” बोलने की लेकिन आवाज गले में ही फंसकर रह जाती है जैसे बंद पिंजरे में कैद पक्षी अंदर ही अंदर कितना भी फड़फड़ाए लेकिन बाहर नहीं निकल पाता ! 
 तुम अक्सर कहा करती थी पेड़ों से जड़ सूख जाने के बाद उसके पत्ते हरे नहीं रह सकते ! अब तुम इसे कभी नहीं दोहराती ! भूल गयी हो शायद ! हाँ अपने काम में सब कुछ तो भूल गयी हो तुम !
हर इंसान की दिली ख्वाहिश होती है कि वो अपने हमसफ़र के साथ एक बेहद हसीन सफ़र की शुरुवात करे और सफ़र के बीच में ही किसी दिलकश राहे-मोहब्बत पर जाकर ठहर जाए ! इस ठहरी हुई राह की कोई मंजिल न हो, कोई पता न हो, कुछ हासिल करने की जल्दी न हो, बेहद अंतहीन, अनंत तक, सबसे पार क्षितिज तक, और हो तो बस दूर दूर तक फैली मोहब्बत की खुशबू ! लेकिन ऐसा होता कहाँ है ! प्यार की राह से हम कब डर, भय, आशंकाओं की राह पर आ जाते हैं, हमें पता ही नहीं चलता ! मोहब्बत किसी टूटी हुई डाली के पत्तों की तरह सूख जाती है,रह जाता है तो बस उसके टूटे फूटे बिखरे कुछ अंश, जिसे समेटने, सहेजने की कोशिश में हम अपनी बाकी जिन्दगी गुजार देते हैं और हमें लगता है हम अब भी मोहब्बत कर रहे हैं, हम सही राह पर हैं ! बैसाखी पर चलने वाली लंगड़ी मोहब्बत को हम 4 पैरों पर नाचने वाली मोहब्बत मान बैठते हैं ! कितना गलत है सब, कितनी झूठी मिथ्याओं पर टिकी है ये दुनिया ! 
हाँ मुझे भी तो अब तुमसे डर लगता है !!

तुम जो बसी हो मुझमें, सम्पूर्ण !!!

हाँ, मैं नही समझ पाता तुम्हे
तुम्हारे जेहन में उठते ख्यालों को
जो शाख से लगे किसी पत्ते की तरह
कभी इस ओर तो कभी उस ओर लुढ़क जाते हैं....
हाँ मेरी आँखें नही पढ़ पाती हैं
तुम्हारे चेहरे पर लिखे भावों को
जो हर पल बदल जाते हैं.....
हाँ नहीं समझ पाता हूँ मैं
तुम्हारे खामोश इशारों को
जो कभी स्पष्ट होते ही नहीं....
हाँ बस इतना जानता हूँ
मोहब्बत थी तुमसे, बेपनाह, है भी
कभी ख़तम भी नही होगी ये
बस क्षीण होती रहेगी धीरे-धीरे
फिर भी तुम बची रह जाओगी अंत तक
कहीं दिल के किसी कोने में सम्पूर्ण !!!